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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि जैन समुदाय, भले ही उसे अल्पसंख्यक दर्जा मिल चुका हो, फिर भी वह हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के दायरे में आता है। हाईकोर्ट ने इंदौर फैमिली कोर्ट के एक विवादित फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें जैन समुदाय के एक दंपति की आपसी सहमति से तलाक की याचिका को खारिज कर दिया गया था।

तलाक याचिका पर विवाद कैसे शुरू हुआ?

इंदौर में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर और उसकी पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी के तहत आपसी सहमति से तलाक की मांग की थी। फैमिली कोर्ट ने 2014 में जैन समुदाय को मिले अल्पसंख्यक दर्जे का हवाला देते हुए याचिका खारिज कर दी। कोर्ट का कहना था कि जैन समुदाय अब हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक का दावा नहीं कर सकता।

फैमिली कोर्ट ने क्यों किया याचिका खारिज?

फैमिली कोर्ट के अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि जैन समुदाय के अनुयायी अब हिंदू विवाह अधिनियम का लाभ नहीं ले सकते, क्योंकि उन्हें अलग से अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त हो चुका है। कोर्ट का तर्क था कि किसी व्यक्ति को ऐसे कानून का लाभ नहीं दिया जा सकता, जो उसके धर्म की मान्यताओं से मेल न खाता हो।

हाईकोर्ट ने क्यों रद्द किया फैमिली कोर्ट का फैसला?

सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने फैमिली कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जैन समुदाय पर हिंदू विवाह अधिनियम पूरी तरह लागू होता है। जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस संजीव एस. कलगांवकर की बेंच ने कहा कि केंद्र सरकार की ओर से जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा देने से इस कानून में कोई बदलाव नहीं हुआ है।

फैमिली कोर्ट के तर्क को क्यों खारिज किया गया?

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को “गंभीर रूप से अवैध” करार दिया और कहा कि भारतीय संविधान और विधायिका ने जैन, बौद्ध, सिख और हिंदू समुदायों को हिंदू विवाह अधिनियम के तहत रखा है। अदालत ने यह भी कहा कि फैमिली कोर्ट को अपने व्यक्तिगत विचार कानून से ऊपर नहीं रखने चाहिए थे।

हाईकोर्ट ने क्या दिशा-निर्देश दिए?

हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि फैमिली कोर्ट जैन दंपति की तलाक याचिका पर कानून के अनुसार कार्यवाही करे। कोर्ट ने कहा कि यदि फैमिली कोर्ट को कोई संदेह था कि जैन समुदाय पर हिंदू विवाह अधिनियम लागू होता है या नहीं, तो उसे हाईकोर्ट से राय लेनी चाहिए थी।

इस फैसले का क्या असर होगा?

इस फैसले से यह साफ हो गया कि भले ही जैन समुदाय को अल्पसंख्यक दर्जा मिल चुका हो, लेकिन वे अब भी हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधानों के तहत आते हैं। इससे भविष्य में ऐसे मामलों में स्पष्टता बनी रहेगी और कानूनी उलझनों से बचा जा सकेगा।