सुप्रीम कोर्ट इस बात पर विचार करेगा कि क्या राज्य अपनी तरफ से किसी वर्ग को पिछड़ा घोषित करते हुए आरक्षण दे सकते हैं या संविधान के 102वें संशोधन के बाद यह अधिकार संसद को है? महाराष्ट्र के मराठा आरक्षण को चुनौती पर सुनवाई करते हुए संविधान पीठ ने माना है कि 102वें संविधान संशोधन के बाद स्थिति में बदलाव हुआ है. इसलिए, इस संशोधन की वैधता और उसके असर पर भी विचार ज़रूरी है.
जस्टिस अशोक भूषण की अध्यक्षता में बैठी 5 जजों की पीठ ने कहा है कि मामले का सभी राज्यों पर असर पड़ेगा. इसलिए, उन्हें भी नोटिस किया जा रहा है. विस्तृत सुनवाई 15 मार्च से शुरू होगी. इसमें इस बात पर भी विचार होगा कि क्या आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तक बनाए रखने वाले फैसले पर भी दोबारा विचार की ज़रूरत है.
2018 में महाराष्ट्र सरकार ने मराठा वर्ग को सरकारी नौकरी और उच्च शिक्षा में 16 प्रतिशत आरक्षण दिया था. इस आरक्षण के पीछे आधार बनाया गया था जस्टिस एन जी गायकवाड़ की अध्यक्षता वाले महाराष्ट्र पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट को. ओबीसी जातियों को दिए गए 27 प्रतिशत आरक्षण से अलग दिए गए मराठा आरक्षण से सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का उल्लंघन हुआ जिसमें आरक्षण की सीमा अधिकतम 50 प्रतिशत ही रखने को कहा गया था.
बॉम्बे हाई कोर्ट में इस आरक्षण को 2 मुख्य आधारों पर चुनौती दी गई. पहला- इसके पीछे कोई उचित आधार नहीं है. इसे सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए दिया गया है. दूसरा- यह कुल आरक्षण 50 प्रतिशत तक रखने के लिए 1992 में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार फैसले का उल्लंघन करता है. जून 2019 में हाई कोर्ट ने इस आरक्षण के पक्ष में फैसला दिया. हाई कोर्ट ने माना कि असाधारण स्थितियों में किसी वर्ग को आरक्षण दिया जा सकता है. हालांकि, आरक्षण को घटा कर नौकरी में 13 प्रतिशत और उच्च शिक्षा में 12 प्रतिशत कर दिया गया.
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मराठा आरक्षण पर रोक लगा रखी है. आज मामले को सुनने बैठी 5 जजों की संविधान पीठ ने महाराष्ट्र के वकील मुकुल रोहतगी, कपिल सिब्बल के अलावा एटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल और दूसरे वरिष्ठ वकीलों को सुना. ज़्यादातर वकीलों का यह मानना था कि मामला सिर्फ मराठा आरक्षण तक सीमित नहीं है. सुनवाई के दौरान संविधान के 102वें संशोधन और अनुच्छेद 324A की वैधता पर विचार करना होगा. संविधान में 2018 में जोड़े गए इस अनुच्छेद के बाद ओबीसी जातियों की लिस्ट में बदलाव की प्रक्रिया भी अनुसूचित जाति जैसी हो गई है. इसमें लिखा गया है कि संसद की स्वीकृति से राष्ट्रपति इस लिस्ट में बदलाव कर सकते हैं. यह राज्य के लिए अलग लिस्ट बनाने के विधानसभा के अधिकार के विरुद्ध है. कोर्ट ने मामले का असर सभी राज्यों पर पड़ने की दलील से सहमति जताते हुए राज्यों को नोटिस जारी कर दिया.